"अगर सब कुछ एक ही पल में मिल जाएगा तो आपका व्यक्तित्व कैसे निखर पाएगा..?
प्रेरणा डायरी ब्लॉग
संघर्ष को सही दिशा में मिलाना ही असली समझदारी है।
हिंडौन सिटी, करौली, राजस्थान, इंडिया।
By - kedar Lal ( सिंह साब ) चीफ एडिटर।
"अगर सब कुछ एक ही पल में मिल जाएगा, तो आपका व्यक्तित्व कैसे निखर पाएगा..?
आज की तेज़ रफ्तार दुनिया ने युवाओं को “फटाफट सफलता” का आदी बना दिया है। बिना इंतज़ार, बिना संघर्ष—बस एक क्लिक और सब कुछ हासिल। लेकिन यही जल्दबाज़ी व्यक्तित्व की जड़ों को खोखला कर देती है। मेहनत से डरना, असफलता से भागना और आराम को प्राथमिकता देना धीरे-धीरे आत्मविश्वास, धैर्य और अनुशासन को खत्म करता है। याद रखिए, आग में तपकर ही सोना चमकता है। संघर्ष इंसान को मजबूत बनाता है, जबकि आसान रास्ते उसे आलसी और निर्भर। जो युवा मेहनत से बचते हैं, वे अवसर तो पा सकते हैं, पर व्यक्तित्व की ऊँचाई कभी नहीं। असली निखार समय, परिश्रम और निरंतर प्रयास से ही आता है।
मैं खुद अपनी बात करूं, तो पहले की अपेक्षा मैं खुद ही बहुत आलसी हो गया। पता नहीं क्यों..? पर ऐसा लगता है कि हमारी युवा पीढ़ी पर कभी न खत्म होने वाली एक सुस्ती सी छाई रहती है। अपना घर साफ करना, खुद के कपड़े प्रेस करना, किताबों को जमाना, अपने कमरे के बिस्तर साफ करना, किसी का हाल-चाल पूछना, मिलने जाना, यहां तक की एक कमरे से निकलकर दूसरे कमरे में जाना - यह सब काम बड़ा मुश्किल होता जा रहा है। टेबल और मैच की जगह बिस्तर पर पढ़ना वही खाना खा लेना और साथ-साथ लगातार फोन देखते रहना यही सब चीज आजकल की पीढ़ी को उपयोगी लगते हैं और इन्हीं में उन्हें आनंद आ रहा है। छोटे बच्चों की भी कमोंबेस यही हालत है। स्कूल जाने से पहले फोन देखते हुए जाना और स्कूल से आते ही अपने कपड़े खोलकर फेंकना और फिर फोन से चिपक जाना। मेरी उम्र 45 वर्ष है और जब हम स्कूल से घर वापस आते थे, तो आज भी मुझे याद है, हम सब दोस्त पेड़ों की लड़कियों से बनाई हुई हॉकी लेकर घंटाे तक खेतों में खेला करते थे। सतौलिए सतौलिया, बरकत डंडा, गिच्ची डंडा, देसी हॉकी,
अब यह खेल कहां देखने को मिलते हैं..अब तो सिर्फ देखने को मिलता..मोबाइल.. दिन भर स्क्रीन टाइम चला है। स्पीडी में जितनी ऊर्जा अणुव्रत फोन देखने और एक क्लिक पर सामान मांगने के लिए है... वैसी ऊर्जा घर से बाहर निकाल कर टहलने व्यायाम करने लाइब्रेरी तक पैदल पहुंचने कुछ मेहनत का काम करने के लिए क्यों नहीं नजर आती है..? ब्रिलिएंट कहलन वाली यह पीढ़ी हजार बातों में अपने माता-पिता से सहमत नहीं होती परंतु प्रतिक्रिया देना उनके लिए आम है. भले ही गलत बात ही हो पर अपने परिजनों से पड़े रहना उनकी फितरत बन गई है। अपनी सोच को लेकर यह बहुत पजेसिव पीढ़ी है और इन लोगों को बिल्कुल यह बात पसंद नहीं कि उनके कंफर्ट जोन को तोडने या उन्हें कुछ सीखने या समझने की जहमत करें।
आजकल सिलिकॉन वैली में एक नारा बड़ा मशहूर है -" तेजी से आगे बढ़ो" यह मंत्र इस पीढ़ी को अक्सर नैतिक गलतियों और अनचाहे नतीजे की ओर ले जाता है। जब तक इंसान लोहे की तरह तपेगा नहीं है, कठिन रास्तों से गुजरेगा नहीं है, मेहनत और जिम्मेदारियां को उठाने से डरता रहेगा, ऐसी हालत में कैसे इनका व्यक्तित्व निखर पाएगा।
अगर हम परिजनों की नजर से इस पीढ़ी को देखें तो पेरेंट्स लगातार मैं गैजेट से दूर रहने की कोशिश करते देखे जाते हैं उनके लिए अपने बच्चों का सर्वांगीण विकास मैं रखता है जबकि यह हाईटेक और इंटेलिजेंट जेनरेशन तकनीकी दक्षता और कंफर्ट जोन को ही अपना लक्ष्य मानती है और शायद यही कारण है कि जिस बात पर में सबसे ज्यादा ऐसे मत होते हैं या जिस बात पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करते हैं वह है मेहनत का महत्व।
पेरेंट्स का मानना है कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए सभी को अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना चाहिए। एकदम सही बात है..। मैं खुद कंफर्ट जोन के कारण अपने कई लक्षणों को आज तक हासिल नहीं कर पाया। अगर कामयाबी हासिल करनी है तो कंफर्ट जोन को तोड़ना ही पड़ता है। लेकिन टेक ब्रांच के लिए तो पूरी दुनिया एक क्लिक पर मौजूद है..फिर मेहनत क्या करना..? अगर यह हाईटेक पद श्रम करेगी, तो फिर निम्न वर्ग क्या करेगा..? यह काम इनका थोड़ी ही है...। श्रम, मेहनत, कठिन परिश्रम यह चीज है तो मजदूर वर्ग के लिए हैं.. इन बेकार की चीजों को आज की यह आधुनिक पीढ़ी भला क्यों अपनाएगी..? वे भला फोन छोड़कर मेहनत का दामन क्यों थामने लगे..? टेक्नोलॉजी कि सपनेली दुनिया ने उन्हें एक ऐसा संसार दिया है जहां उनकी हर अब सुविधा खत्म हो चुकी है। सब कुछ इंस्टेंट डिलीवर हो जाता है अब तो सोने का काम भी बुद्धिमान चैट बॉक्स, चैट Gpt और Ai के हवाले कर दिया गया है।
यह बाद मुझे हैरान करती है कि जिस सोच विचार से, हमारी पीडियों का बौद्धिक विकास होता था..उनका मानसिक विकास होता था. मस्तिष्क की कसरत होती थी.. स्मरण शक्ति का विकास होता था। अब वह सोचने समझने का काम भी हमने मशीनों के हवाले कर दिया।
लेकिन यह भी बात माननी पड़ेगी की नई पीढ़ी की इन बेड हैबिट्स विलासिता और आरामदायक जिंदगी की वजह से ही "फ्रिक्शन मिक्सिंग" जैसी नई चीजों को जन्म दे दिया है जो हमारी दिनचर्या में असुविधा की वापसी करती हैं। यह सिद्धांत शरीर की गतिशीलता और उसकी प्रयत्नशीलता का समर्थन करता है। फ्रिक्शन मिक्सिंग एक ऐसी थिंकिंग है जो कहती है कि घर बैठकर खाना मांगने की बजे बाहर निकालो ट्रैफिक का सामना करो ऑर्डर करो वहां लाइन में लगो थोड़ा पसीना बहन धैर्य रखो और ऐसे माहौल में रहने की क्षमता को विकसित करता है जिस पर हमारा नियंत्रण नहीं है क्योंकि खुद को मुश्किल स्थिति में डालना ही हमारे व्यक्तित्व को निखारता है।
आजकल युवाओं की सोच में “फ्रिक्शन मिक्सिंग” कोई टेक्निकल शब्द नहीं, बल्कि ज़िंदगी जीने का नया माइंडसेट है। इसका मतलब है—कठिनाइयों, टकरावों और असहज परिस्थितियों को नज़रअंदाज़ करने के बजाय, उनसे कुछ नया और बेहतर पैदा करना।
जैसे एग्जांपल : जॉब से बोरियत और साइड हसल, चीजों को लेकर कई युवा नौकरी से बोर हैं, लेकिन वे जॉब छोड़ने के बजाय जब के साथ कुछ नई चीज ट्राई करते हैं। फ्रीलांसिंग, कंटेंट क्रिएशन, या स्टार्टअप आइडिया, को साइड में शुरू करते हैं। जॉब की स्थिरता और सपनों की आज़ादी—दोनों का मिश्रण ही फ्रिक्शन मिक्सिंग है। फ्रिक्शन मिक्सिंग आलस्य नहीं, बल्कि स्मार्ट संघर्ष है।
आलसी और सुस्त जिंदगी जीने के बाद अब युवा जान चुका है कि बिना टकराव के - " ना तो व्यक्तित्व निखरता है, ना भविष्य बनता है।"
संघर्ष को सही दिशा में मिलाना ही असली समझदारी है।
"अगर सब कुछ एक ही पल में मिल जाएगा तो आपका व्यक्तित्व कैसे निखर पाएगा..?
आज के समय में युवा त्वरित सफलता के पीछे भाग रहे हैं। सोशल मीडिया, इंस्टेंट रिवॉर्ड और शॉर्टकट कल्चर ने यह भ्रम पैदा कर दिया है कि बिना संघर्ष के भी सब कुछ पाया जा सकता है। लेकिन तथ्य बताते हैं कि व्यक्तित्व का विकास समय, धैर्य और प्रयास से ही होता है। मनोवैज्ञानिक शोधों के अनुसार, जो व्यक्ति चुनौतियों का सामना करते हैं, उनमें निर्णय लेने की क्षमता, आत्म-नियंत्रण और आत्मविश्वास अधिक मजबूत होता है। असफलताओं से सीखने की प्रक्रिया व्यक्ति को भावनात्मक रूप से परिपक्व बनाती है। वहीं, बिना मेहनत मिली सफलता अक्सर अस्थायी और खोखली साबित होती है।
इतिहास और वर्तमान के सफल व्यक्तियों पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि उनके जीवन में संघर्ष एक अनिवार्य तत्व रहा है। यह संघर्ष ही उन्हें अनुशासन, जिम्मेदारी और नेतृत्व जैसे गुण सिखाता है।
बात का निष्कर्ष और फंडा यह है कि अगर सब कुछ तुरंत मिल जाए तो सीखने की प्रक्रिया रुक जाती है। व्यक्तित्व निखारने के लिए जरूरी है कि इंसान रास्ते की कठिनाइयों से गुजरे, क्योंकि संघर्ष ही इंसान को अंदर से मजबूत बनाता है।
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