दुनियाँ के सबसे खुश इंसान - बौद्ध संत "मैथयू रिकार्ड" से जानिए खुशी की तीन सूत्र।

प्रेरणा डायरी 
टोडाभीम, राजस्थान - 321610 भारत।

 खुशी की कुंजी -- संतोष और आनंद के लिए अभ्यास सबसे जरूरी।
 मैथयू रिकॉर्ड - प्रसिद्ध बौद्ध संत और दुनिया के सबसे खुश व्यक्ति के रूप में पहचान। आज के आर्टिकल में लिए जानते हैं उनके जीवन की खुश रहने के प्रमुख सूत्र।

- मैंने कभी दुख से लड़ना नहीं सीखा, बल्कि उसके साथ रहना सीखा है। और इस यात्रा में मैं खुश रहने के कुछ जरूरी नियम सीखे हैं जो आपके साथ शेयर करना चाहता हूं - 

1. पहला नियम - 

दुख सभी के जीवन में है.. और करुणा ही इसका समाधान है।
मुझे आज भी बहुत सी चीजों पर रोष आता है.. गुस्सा आता है। लेकिन रोष गुस्से जैसा नहीं है। यह किसी को नुकसान पहुंचाने की इच्छा से नहीं आता यह करुणा से जुड़ा हुआ है गुस्सा कभी-कभी 20 से पैदा होता है उसमें सामने वाले को झूठ पहुंचने की चाहत छुपी हुई होती है लेकिन रूस वह बेचैनी है जो हमें गलत को ठीक करने के लिए मजबूर करती है वह करुणा का ही रूप है करुणा यानी जहां भी दुख है उसके खत्म होने की कामना।  

करुणा क्या होती है..?

करुणा का अर्थ है—दूसरे के दुःख को देखकर मन में सहज संवेदना जागना और उस दुःख को कम करने की सच्ची भावना रखना। यह केवल सहानुभूति (Sympathy) नहीं है, बल्कि उससे एक कदम आगे है। सहानुभूति में हम दुःख को समझते हैं, जबकि करुणा में हम उसे दूर करने के लिए भीतर से प्रेरित होते हैं—चाहे वह भाव, शब्द या कर्म के रूप में हो।

सरल शब्दों में कहें -

“जब किसी का दर्द हमें भीतर से छू जाए और हम उसके लिए कुछ करना चाहें, वही करुणा है।”
दुःख क्या है?
दुःख केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं आता, बल्कि कई बार हमारी अपेक्षाएँ,अहंकार, तुलना,अज्ञान, अस्वीकार से भी उत्पन्न होता है। मन जब वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर पाता, तब दुःख जन्म लेता है।

क्या करुणा से दुख का समाधान संभव है..? 

हाँ—बहुत हद तक संभव है। करुणा दुःख को जड़ से समाप्त नहीं करती, लेकिन दुःख के प्रभाव को अवश्य कम कर देती है।
1. स्वयं के प्रति करुणा  (Self-Compassion)
हम अपने सबसे बड़े आलोचक स्वयं होते हैं।
जब हम अपनी गलतियों, असफलताओं और कमज़ोरियों को करुणा से स्वीकार करते हैं, तब
अपराधबोध कम होता है
आत्मग्लानि घटती है
मानसिक शांति बढ़ती है
-- खुद को कठोरता से नहीं, समझदारी से देखना ही आत्म-करुणा है।
2. दूसरों के प्रति करुणा - 
जब हम दूसरों के दुःख को समझते हैं, तो
क्रोध कम होता है
द्वेष घटता है
संबंधों में मिठास आती है
कई बार हमारा दुःख इसलिए बढ़ता है क्योंकि हम दूसरों से लड़ रहे होते हैं।
करुणा उस संघर्ष को संवाद में बदल देती है।

3. करुणा अहंकार को पिघलती है -

अहंकार कहता है—“मैं सही हूँ, दुनिया गलत है।”
करुणा कहती है—“हर कोई अपने-अपने संघर्ष से जूझ रहा है।”
जैसे ही अहंकार ढीला पड़ता है, मन हल्का हो जाता है—और यही दुःख से मुक्ति की शुरुआत है।
क्या करुणा दुःख को पूरी तरह समाप्त कर देती है?
नहीं, जीवन में दुःख आएगा ही—
लेकिन करुणा दुःख को बोझ नहीं बनने देती।
यह हमें दुःख से लड़ने की जगह, उसे समझने और स्वीकार करने की शक्ति देती है।
बुद्ध का कथन सार रूप में यही है—
“दुःख है, दुःख का कारण है और दुःख का निरोध भी संभव है।”
और उस मार्ग का एक प्रमुख आधार करुणा ही है।

निष्कर्ष के तौर पर मैं कह सकता हूं कि--

करुणा कमजोरी नहीं, बल्कि मानसिक शक्ति है
यह दुःख को मिटाती नहीं, पर उसकी तीव्रता घटा देती है
करुणा हमें मनुष्य बनाती है—स्वयं के लिए भी और दूसरों के लिए भी
जहाँ करुणा है, वहाँ दुःख टिक नहीं पाता।
यदि आप चाहें तो मैं इसे दार्शनिक दृष्टिकोण, बौद्ध दर्शन, या आधुनिक मनोविज्ञान के संदर्भ में भी और गहराई से समझा सकता हूँ।


2 दूसरा नियम 


खुशी एक स्किल है.. जितना अभ्यास उतना अनुभव।

 मैं कोई सुंदर संगीत दो-तीन बार सुन सकता हूं इससे अधिक 10 बार सुन सकता हूं लेकिन मैं उसे लगातार पूरे दिन या कई दिन तक नहीं सुन सकता क्योंकि यह आनंद की एक प्रकृति होती है वह धीरे-धीरे हल्का पड़ जाता है कभी साधारण लगने लगता है और कभी उससे मन ऊब जाता है और कई बार हालात बदलते ही वह मिलना ही बंद हो जाता है। खुशी इससे अलग चीज है। खुशी जमा करने से नहीं आती है वह भीतर गहराई से पैदा होती है जितना ज्यादा आप उसे जीते हैं वह उतनी ही गहरी होती जाती है ज्यादा फैलती है और हालात बदलने से उतनी प्रभावित नहीं होती है। 

खुशी को हम अक्सर एक “परिस्थिति” मान लेते हैं, जबकि वास्तविकता में खुशी एक “स्किल (कौशल)” है—जिसे सीखा, साधा और बढ़ाया जा सकता है। आइए इसे क्रमबद्ध और उदाहरणों के साथ समझते हैं।

खुशी स्किल कैसे हैं..? 

स्किल वह होती है जो - अभ्यास से बेहतर होती है, समय के साथ निखरती है, परिस्थितियों से स्वतंत्र होकर भी काम करती है
जैसे—ड्राइविंग, संगीत, खेल या ध्यान। खुशी भी वैसी ही है।
यह इस पर निर्भर नहीं करती कि आपके पास क्या है, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि आप अपना ध्यान, सोच और प्रतिक्रिया कैसे संभालते हैं।
 
उदाहरण से समझे खुशी बनाम पारिस्थिति

🔹 उदाहरण 1: दो लोग, एक ही स्थिति
मान लीजिए—
दो लोगों की नौकरी चली जाती है।
व्यक्ति A:
“सब खत्म हो गया, मैं असफल हूँ।” → तनाव, डर, दुःख
व्यक्ति B:
“यह कठिन है, लेकिन यह सीखने और नए अवसर का समय है।” → आशा, शांति
 स्थिति समान है, पर खुशी का स्तर अलग। क्यों?
क्योंकि व्यक्ति B ने अपनी मानसिक स्किल का उपयोग किया।

खुशी की पांच मुख्य स्किल्स 

1️⃣ ध्यान का कौशल (Attention Skill)
हम जहाँ ध्यान लगाते हैं, वहीं हमारा अनुभव बनता है।
🔸 अभ्यास:
दिन में 2 मिनट सिर्फ यह देखें—आज क्या ठीक है?
समस्या नहीं, समाधान पर ध्यान दें
इससे दिमाग “खुशी देखने” का अभ्यास करता है।

2️⃣ व्याख्या का कौशल (Interpretation Skill)
एक घटना को हम कैसे अर्थ देते हैं—वही खुशी तय करता है।
🔸 उदाहरण:
बारिश को कोई “बर्बादी” कहता है, कोई “ठंडक और हरियाली”।
🔸 अभ्यास:
हर नकारात्मक घटना से पूछें:
“इसमें सीख क्या है?”

3️⃣ कृतज्ञता की स्किल (Gratitude Skill)
खुशी पाने की नहीं, देखने की कला है।
🔸 अभ्यास:
रोज़ 3 बातें लिखें जिनके लिए आप आभारी हैं
बहुत बड़ी नहीं, छोटी भी चलेगी—चाय, नींद, किसी की मुस्कान
विज्ञान कहता है: कृतज्ञता से मस्तिष्क में खुशी के हार्मोन बढ़ते हैं।

4️⃣ भावनात्मक नियंत्रण की स्किल (Emotional Regulation)
खुशी का मतलब नकारात्मक भाव न होना नहीं,
बल्कि उनसे बह जाना नहीं।
🔸 उदाहरण:
जैसे तैराक पानी में रहता है पर डूबता नहीं।
🔸 अभ्यास:
गुस्सा आए तो तुरंत प्रतिक्रिया नहीं, 3 गहरी साँस
भावना को नाम दें: “यह क्रोध है, मैं क्रोध नहीं हूँ।”

5️⃣ अर्थ खोजने की स्किल (Meaning Skill)
जब जीवन में अर्थ होता है, तब दुःख भी सहने योग्य हो जाता है।
🔸 उदाहरण:
माता-पिता बच्चे के लिए कष्ट सह लेते हैं—क्योंकि उसमें अर्थ है।
🔸 अभ्यास:
खुद से पूछें:
“मैं जो कर रहा हूँ, उससे किसे लाभ हो रहा है?”

अभ्यास और अनुभव से खुशी कैसे बढ़ती है..?

🔁 खुशी का "मसल सिद्धांत"
जैसे जिम में मसल बनती है— रोज़ थोड़ा अभ्यास, शुरू में थकान होती है लेकिन बाद में ताकत मिलती है।
शुरू में थकान
बाद में ताकत
 वैसे ही खुशी भी दैनिक मानसिक अभ्यास से बढ़ती है।

 7 दिन का सरल खुशी अभ्यास प्लान 

दिन 1–2:
- दिन में 2 बार साँस पर ध्यान (1 मिनट)
दिन 3–4:
- शिकायत पकड़िए और एक कृतज्ञता जोड़िए
दिन 5:
- किसी की निस्वार्थ मदद
दिन 6:
- एक नकारात्मक सोच को लिखकर उसका सकारात्मक अर्थ खोजिए
दिन 7:
- पूरे सप्ताह की 5 अच्छी बातों को याद करें

अनुभव हमें क्या सीखना है  अनुभव क्या सिखाता है..?
अनुभव हमें यह सिखाता है कि— बाहरी चीज़ें अस्थायी हैं, प्रतिक्रिया हमारी शक्ति है, खुशी “मिलती” नहीं, उत्पन्न होती है
धीरे-धीरे दिमाग स्वाभाविक रूप से शांत और संतुष्ट रहना सीख जाता है।

निष्कर्ष के तौर पर मैं कहना चाहता हूं कि
खुशी एक स्किल है, संयोग नहीं
इसे अभ्यास, सजगता और अनुभव से बढ़ाया जा सकता है
परिस्थितियाँ नहीं बदलतीं, हम बदलते हैं
खुशी बाहर नहीं, आपके अभ्यास में छुपी है। यदि चाहें तो  इसे
बौद्ध ध्यान पद्धति, आधुनिक न्यूरोसाइंस, या दैनिक जीवन के उदाहरणों से और गहराई से समझ सकता हूँ। 

3. तीसरा नियम 

बिना शर्त प्रेम करना सीखें 

 अगर आप किसी की मदद करें लेकिन दिल से परवाह ही न करें तो आपको अच्छा लगेगा ही नहीं दूसरों की भलाई और अपनी खुशी को अलग करना ऐसा ही है जैसे आप आग जलाना और कहना कि वह गर्मी ने दे। हम सब ने कभी ने कभी बिना शब्द प्रेम महसूस किया है किसी बच्चे के लिए किसी कमजोरी के लिए किसी बीमार के लिए किसी दुखी आदमी के लिए यह भावना कुछ सेकंड रहती है फिर चली जाती है मेरी साधना उसे भावनाओं को थोड़ी देर रुकना सीखना है अगर। अगर ऐसी भावना खत्म होने लगे तो उसे फिर से अर्जित करना जरूरी है। उसे वापस लाना हमें आना चाहिए 20 मिनट रोज इस बात का अभ्यास जरूरी है 3 हफ्ते भी काफी हैं यही ध्यान है यही अभ्यास परिवर्तन की शुरुआत है मैं भी सीख रहा हूं लेकिन अगर जीवन में कोई एक दिशा चुन्नी हो तो दूसरों की खुशी की इमानदारी से कामना करना खुद के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता है। बिना सर्च प्रेम जरूरी है अगर प्रेम में शर्ट या स्वार्थ हो तो फिर वह प्रेम नहीं है। 

आर्टिकल का निष्कर्ष /सारांश

निष्कर्ष
बौद्ध संत मथ्यु रिकॉर्ड के अनुसार, खुशी कोई बाहरी परिस्थिति नहीं बल्कि एक आंतरिक अवस्था है, जिसे अभ्यास, समझ और करुणा के माध्यम से विकसित किया जा सकता है। वे यह स्पष्ट करते हैं कि धन, पद, प्रसिद्धि या भौतिक सुख क्षणिक आनंद तो दे सकते हैं, लेकिन स्थायी खुशी नहीं। सच्ची खुशी तब उत्पन्न होती है जब मन शांत, संतुलित और सकारात्मक भावनाओं से भरा हो।
मथ्यु रिकॉर्ड का मानना है कि करुणा ही सुख का मूल आधार है। जब हम दूसरों के दुःख को समझते हैं, उनके कल्याण की कामना करते हैं और निःस्वार्थ भाव से कार्य करते हैं, तो हमारा मन स्वाभाविक रूप से हल्का और प्रसन्न हो जाता है। करुणा केवल दूसरों के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के प्रति भी आवश्यक है। आत्म-स्वीकृति और आत्म-दया मानसिक शांति की पहली सीढ़ी है।
वे ध्यान (Meditation) को मानसिक प्रशिक्षण का सर्वोत्तम साधन मानते हैं। नियमित ध्यान अभ्यास से व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं को बेहतर ढंग से समझ पाता है, नकारात्मक भावनाओं जैसे क्रोध, ईर्ष्या और भय पर नियंत्रण कर पाता है तथा सकारात्मक भावनाओं को विकसित करता है। मथ्यु रिकॉर्ड के अनुसार, जैसे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम आवश्यक है, वैसे ही मन को स्वस्थ रखने के लिए ध्यान आवश्यक है।
अंततः, मथ्यु रिकॉर्ड हमें यह सिखाते हैं कि खुशी एक कौशल (Skill) है, जिसे सीखा और निखारा जा सकता है। यदि हम अपने दृष्टिकोण को बदलें, करुणा को जीवन का केंद्र बनाएं, वर्तमान क्षण में जीना सीखें और मन को प्रशिक्षित करें, तो हम न केवल स्वयं खुश रह सकते हैं, बल्कि समाज और दुनिया को भी अधिक शांत, करुणामय और सुखी बना सकते हैं। यही उनके दर्शन का सार और मानवता के लिए उनका अमूल्य संदेश है।

 संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर 


नीचे बौद्ध संत मथ्यु रिकॉर्ड (Matthieu Ricard) द्वारा बताए गए खुश रहने के तीन सूत्र — करुणा, मानसिक प्रशिक्षण (ध्यान) और सही दृष्टिकोण/बुद्धि — पर आधारित 8 अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर प्रस्तुत हैं, जो 

Question 1. बौद्ध संत मैथ्यू रिकॉर्ड के अनुसार सच्ची खुशी क्या है..? 
उत्तर: मथ्यु रिकॉर्ड के अनुसार सच्ची खुशी बाहरी सुख-सुविधाओं पर निर्भर नहीं होती, बल्कि यह मन की आंतरिक शांति, संतुलन और सकारात्मक भावनाओं से उत्पन्न होती है। यह एक स्थायी अवस्था है, क्षणिक आनंद नहीं।

Question 2. : खुश रहने का पहला सूत्र “करुणा” क्यों सबसे महत्वपूर्ण है?

उत्तर: करुणा दूसरों के दुःख को समझने और उनके कल्याण की भावना रखने की क्षमता है। मथ्यु रिकॉर्ड के अनुसार करुणा से स्वार्थ कम होता है, मन शांत होता है और गहरी संतुष्टि मिलती है, जो स्थायी खुशी का आधार है।

Question 3. क्या  केवल दूसरों के प्रति करुणा ही पर्याप्त है..?
उत्तर: नहीं, स्वयं के प्रति करुणा भी उतनी ही आवश्यक है। आत्म-स्वीकृति और आत्म-दया व्यक्ति को अपराधबोध, तनाव और आत्म-आलोचना से मुक्त करती है, जिससे मानसिक संतुलन बनता है।

प्रश्न 4: खुश रहने का दूसरा सूत्र “मानसिक प्रशिक्षण” क्या है?

उत्तर: मानसिक प्रशिक्षण का अर्थ है ध्यान और सजगता के माध्यम से मन को प्रशिक्षित करना। इससे व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं पर नियंत्रण सीखता है और नकारात्मक भावनाओं से मुक्त होता है।

प्रश्न 5: ध्यान (Meditation) खुशी बढ़ाने में कैसे मदद करता है?

उत्तर: ध्यान मन को शांत करता है, एकाग्रता बढ़ाता है और क्रोध, भय व ईर्ष्या जैसी नकारात्मक भावनाओं को कम करता है। इससे व्यक्ति वर्तमान क्षण में जीना सीखता है, जो खुशी का महत्वपूर्ण स्रोत है।

प्रश्न 6: खुश रहने का तीसरा सूत्र “सही दृष्टिकोण” क्या है?

उत्तर: सही दृष्टिकोण का अर्थ है जीवन को यथार्थ रूप में देखना, अस्थिरता को स्वीकार करना और यह समझना कि सुख-दुःख अस्थायी हैं। यह समझ व्यक्ति को निराशा और अत्यधिक अपेक्षाओं से बचाती है।

प्रश्न 7: क्या खुशी को सीखा और विकसित किया जा सकता है?
उत्तर: हाँ, मथ्यु रिकॉर्ड के अनुसार खुशी एक कौशल (Skill) है। जैसे पढ़ना या खेल सीखते हैं, वैसे ही अभ्यास, ध्यान और करुणा के माध्यम से खुशी को विकसित किया जा सकता है।

प्रश्न 8: मथ्यु रिकॉर्ड के तीन सूत्र आज के तनावपूर्ण जीवन में कैसे उपयोगी हैं?

उत्तर: करुणा से संबंध बेहतर होते हैं, ध्यान से तनाव घटता है और सही दृष्टिकोण से जीवन की कठिनाइयों को स्वीकार करने की शक्ति मिलती है। ये तीनों सूत्र मिलकर व्यक्ति को मानसिक रूप से मजबूत और वास्तव में खुश बनाते हैं। 


 लेखक परिचय 

 
   फोटो - केदार लाल ( सिंह साहब, लिग़री ) चीफ एडिटर प्रेरणा डायरी ब्लॉग।

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