छात्र अपने मन और बुद्धि की कंट्रोलिंग और रूलिंग पावर को कैसे बढ़ाएं..?

आज के जमाने में सबसे सरल कार्य है - दूसरों को सलाह देना। हम दिन भर बैठे-बैठे बातें बना देंगे, - कि देश को ऐसे चलना चाहिए। परिवार ऐसे चलता है.।  समाज मे ऐसा होना चाहिए.। घर गृहस्ती ऐसे चलनी चाहिए। सरकार को ऐसा नहीं, वैसा करना चाहिए था। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम अपने घर के चार-पांच सदस्यों के बीच संतुलन और प्रेम बनाए रखने में कामयाब है। दूसरों मे कमिया गिना रहें है, पर क्या हम खुद अपनी जिम्मेदारी और काम को ठीक से निभा पा रहे हैं। जो हमारा स्वयं का कर्तव्य है उसे ढंग से कर पा रहे हैं..। जिस कार्य को हमने कभी किया ही नहीं, उसे पर दूसरों को सलाह-मशवारा अपने शब्दों की खपत है, और कुछ नहीं। अनुभव से निकली हुई बात में शक्ति होती है पर बिना अनुभव के सलाह देना केवल ऊर्जा और समय की बर्बादी है।




 सच्ची शक्ति रनिंग पावर और कंट्रोलिंग पावर में है अर्थात स्वयं पर शासन करने की क्षमता। जब तक मां वाणी और कर्मेंद्रियों पर हमारा नियंत्रण नहीं होगा तब तक हम परिवार कार्य स्थल समाज और देश को सही दिशा नहीं दे सकते।
मैं अपनी चर्चा को आगे बड़ो उससे पहले लिए मैं आपको बताता हूं की मां और बुद्धि की कंट्रोलिंग और रनिंग पावर होती क्या है..?

मन और बुद्धि की रूलिंग पावर (Ruling Power) यानी उन पर शासन करने वाली शक्ति जागरूकता या आत्मनियंत्रण होती है। मन हमेशा इच्छाओं, भावनाओं और त्वरित सुख की ओर भागता है, जबकि बुद्धि सही-गलत का निर्णय लेकर हमें सही दिशा दिखाती है। उदाहरण के लिए जब कोई विद्यार्थी पढ़ाई करने बैठता है, उसी समय मन उसे मोबाइल देखने या आराम करने के लिए प्रेरित करता है। लेकिन बुद्धि उसे याद दिलाती है कि परीक्षा पास करनी है और समय की कीमत समझनी चाहिए। उस क्षण अंतिम निर्णय विद्यार्थी की जागरूकता लेती है कि वह किसकी बात मानेगा। यदि वह मन की सुनता है तो समय नष्ट होता है और बाद में पछतावा होता है। यदि वह बुद्धि की सुनता है तो सफलता की ओर बढ़ता है। जीवन के हर छोटे-बड़े फैसले में यही प्रक्रिया चलती रहती है। इसलिए कहा जाता है कि आत्मनियंत्रण ही मन और बुद्धि की असली रूलिंग पावर है।

मन और बुद्धि की रूलिंग पावर को गाड़ी के उदाहरण से समझा जा सकता है। मन गाड़ी का एक्सीलेटर है जो हमें तेज़ी से आगे बढ़ाना चाहता है, जबकि बुद्धि ब्रेक और स्टेयरिंग की तरह है जो दिशा और गति को नियंत्रित करती है। इन दोनों को चलाने वाला असली चालक हमारी चेतना होती है। मान लीजिए किसी व्यक्ति को गुस्सा आता है, मन तुरंत प्रतिक्रिया देने और झगड़ा करने को कहता है। उसी समय बुद्धि समझाती है कि गुस्से में लिया गया निर्णय नुकसान पहुंचा सकता है। यदि व्यक्ति अपनी जागरूकता से बुद्धि की बात मान लेता है तो वह शांत रहकर स्थिति संभाल लेता है। इसके विपरीत यदि वह मन के बहाव में आ जाता है तो रिश्ते और अवसर दोनों प्रभावित हो सकते हैं। जीवन की सफलता इसी संतुलन पर निर्भर करती है कि हम मन को नियंत्रित कर बुद्धि का मार्ग अपनाएँ। जब चेतना जागृत रहती है, तभी मन और बुद्धि सही दिशा में चलते हैं।
 जैसा मैंने पहले कहा कि सच्ची शक्ति रनिंग पावर और कंट्रोलिंग पावर में है, यही वह शक्ति है जो हमें स्वयं पर शासन करने की ऊर्जा और क्षमता प्रदान करती है। यदि कोई प्रेम से आग्रह करें और हम केवल उसे प्रसन्न करने के लिए अपनी इच्छा शक्ति तोड़ दें तो यह स्वराज नहीं दस्ता है। 
 हम अक्सर यह सोचकर जीते हैं की कही किसी को कुछ बुरा न लग जाए दूसरों को खुश रखने की चिंता में हम अपने मन की शक्ति खो देते हैं अपने आत्मिक शक्ति को छीन कर देते हैं पर यदि सचमुच दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए स्वयं को तोड़ देना ही संबंधों को मजबूत बनाता है तो आज रिश्ते इतने कमजोर क्यों हो रहे हैं.? छोटी-छोटी बातों पर लोग नाराज हो जाते हैं संवाद बंद कर देते हैं पुरानी बातें पकड़ कर बैठ जाते हैं यहां तक की स्कूल के बच्चे भी अवसाद की बात कर रहे हैं क्या यह सशक्त परिवारों की पहचान है.?
 वास्तव में हम जो कुछ करते हैं वह केवल दूसरों के लिए नहीं बल्कि अपने स्टेटस के लिए कारण करते हैं। चाहे वह स्वम का आकर्षक हो या स्वाद का आकर्षण या किसी की कमजोरी सुनने का। हम कहते तो यह हैं कि उसकी वजह से किया पर निर्णय हमारा अपना था जीवन हमें तीन विकल्प देता है राजा बना प्रजा बना या गुलाम बनना। राजा वह है जो अपनी इंद्रियों और मां प्रशासन करता है छोटी-छोटी आदतों से स्वराज की शुरुआत होती है यदि हम भोजन में संयम रखते हैं तो वह केवल खाने पर नियंत्रण नहीं बल्कि मां पर विजय का अभ्यास है यदि हम किसी की बुराई सुनने से इनकार कर दें तो स्पष्ट करें मैं प्रतिज्ञा की है कि मैं किसी की कमजोरी नहीं तो ऐसा करके आप अपने आत्म बल की घोषणा करते हैं हमारे शब्द किसी का भाग्य भी बना सकते हैं तो किसी का भाग्य बिगड़ भी सकते हैं इसलिए वाणी आशीर्वाद बने आलोचना नहीं 
 मून इस साधना का प्रभावी माध्यम है प्रतिदिन एक निश्चित समय विशेष कर प्रातकाल मून का अभ्यास करें मोहन से मुख पर नियंत्रण आता है और मुख पर नियंत्रण से मां पर नियंत्रण आता है बिना नियंत्रण की गाड़ी दुर्घटना की ओर जाती है उसी प्रकार ए नियंत्रित वाणी मां और जीवन को अशांत कर देती है यदि आवश्यक हो तो संकेत या लिखित माध्यम से कार्य करें पर मुख को अनुशासित रखें यही छोटी-छोटी साधनाएं इच्छा शक्ति को प्रबल बनती हैं 


 अंततः जीवन का लक्ष्य दूसरों को गलत तरीके से प्रसन्न करना नहीं बल्कि स्वयं को सशक्त और पवित्र बनाना है जो व्यक्ति जीते जी बेदाग रहता है वहीं अंत समय में भी हल्का और शांत रहता है आज से संकल्प करें कि हम अपने कर्मेंद्रियों के राजा हैं यही सच्चा स्वराज है यही आत्मिक शक्ति का आधार है और यही सफल संतुलित और शांत जीवन का मार्ग है
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