अच्छी और खुशनुमा शख्सियत बनाने के 20 बेहतरीन और नायाब तरीक़े।

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प्रेरणा डायरी (ब्लॉग )
टुड़ावली, करौली, राजस्थान - 321610

 अच्छी और  खुशनुमा शख्सियत बनाने के 20 बेहतरीन तरीके     या

कैसे अपनी जिन्दगी को अच्छी और सफल बना सकतें है स्टूडेंट.?





 टेबल ऑफ़ कंटेंट 

1. उत्तरदायित्व/ जिम्मेदारी स्वीकार करें। 

- आरोप लगाना बंद करें।
- जिम्मेदारियां से भागना तंग दिमाग की निशानी
- सामाजिक जिम्मेदारी।
- जिम्मेदारी 
2. दूसरों की परवाह करें।
3. सबकी जीत के बारे में सोचें।
4. अपने शब्दों का चयन सोच समझकर करें।
- मुंह से निकली बात वापस नहीं आती।
- कहानी।
5. आलोचना और शिकायत ना करें 
- सही आलोचना.
- प्रेरित करने वाली आलोचना के बारे में सोच रहा हूं।
- आलोचना स्वीकार करना।
- आलोचना स्वीकार करने के सुझाव।
- शिकायतें

6. मुस्कुराए और दयालु बने:






 उत्तरदायित्व जिम्मेदारी स्वीकार करें :


 आर्टिकल में आगे बढ़ने से पहले लिए हम दुनिया के कुछ प्रसिद्ध विद्वानों के कथन पढ़ते हैं, इसे आपको उसे बात को समझने में आसानी होगी जिसे मैं आपको बताना चाहता हूं --

 "जिसे उड़ाना सीखना हो, उससे पहले खड़े होना, चलना और दौड़ना आना चाहिए।"


-- फ्रेडरिक  नितज़े।


 "जिम्मेदारियां उस व्यक्ति की तरफ खींची चली जाती है, जो उन्हें कंधे पर उठा सकता है। 

 -- अल्बर्ट हबई ।


मैंने देखा है कि हम में से अधिकतर लोग अपनी जिम्मेदारियां से भागते हैं मैं खुद भी उन्हें शामिल हूं 40 वर्ष की उम्र तक मैं अपनी जिम्मेदारियां से भागता रहा हूं। लेकिन आखिरकार जब उन्हें उठाना शुरू किया तभी जिंदगी में खुशनुमा बदलाव आए। जो लोग जिम्मेदारियां से डरते हैं अक्सर वह यह नहीं जानते की जिम्मेदारियां को स्वीकार करना अपनी उन्नति के दरवाजे खोलता है। 
जवाबदेही को स्वीकार करना ही जिम्मेदारी होती है। जिम्मेदारियां को उठाना एक छात्र या व्यक्ति की समझदारी और परिपक्वता को दर्शाता है। जिम्मेदारी कबूल करने की भावना हमारे नजरिए और उसे माहौल की छवि होती है,जिसमें हम काम करते हैं। ज्यादातर लोग कुछ अच्छा होने पर तुरंत श्री ले लेते हैं मगर बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो गलती होने पर अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। अगर एक व्यक्ति जिम्मेदारियां को स्वीकार नहीं करता तो उनसे उसे छुटकारा नहीं मिलता है इसलिए आपका मकसद जिम्मेदार व्यवहार का विकास होना चाहिए। 

 - आरोप लगाना बंद करें :

 यह कहना छोड़ दे कि --

* यह मेरी जिम्मेदारी नहीं है।
* ऐसा तो कोई नहीं करता 
* सारा दोष तुम्हारा है। 


 जो लोग खुद अपनी उत्तरदायित्व स्वीकार नहीं करते वह अक्सर भगवान,भाग्य,गृह,नक्षत्र ऊपरवाले,मां-बाप,गुरु, स्कूल,कॉलेज,आदी को दोस् देने लगते हैं. हमें अपने बच्चों में जिम्मेदार व्यवहार का विकास बचपन से ही करना चाहिए। लेकिन अगर किसी में एक हद तक आज्ञा पालन की भावना न हो तो उसे इस तरह का व्यवहार करना नहीं सिखाया जा सकता। आज्ञा पालन का भाव हमें जिम्मेदार बनाता है। 
 जो लोग बिना जिम्मेदारी स्वीकार किए गए अपने अधिकारों का प्रयोग करते हैं वह अक्सर अपने अधिकारों को भी खो देते हैं।


 जिम्मेदारियों से भागना तंग दिमाग की निशानी..

 जरा सोच कर देखिए की तंग  दिमाग वाले लोग जरूरी कामों को करने के बजाय जिम्मेदारियां औरों के कंधों पर डालने की कोशिश में लगे रहते हैं। आप उनसे किसी भी काम के लिए कहेंगे वह इस काम को किसी और तीसरे आदमी को सौंप देंगे। 

 सामाजिक जिम्मेदारी

 पुरानी भारतीय मान्यता हमेशा सिखाती है कि हमारी पहली जिम्मेदारी समाज के प्रति है, दूसरी परिवार के प्रति और  तीसरी खुद के प्रति बनती है। जितने समय तक इस सिद्धांत का पालन होता रहा वह समाज प्रगति और उन्नति करता रहा। वह जब समाज और संस्कृतियों में इस और इसके जैसे अनेक सिद्धांतों का क्रम उल्टा हुआ, और ऐसा होते ही समझो उसे संस्कृति का पतन शुरू..। 
 
2.  दूसरों की परवाह करें :

 इस बिंदु पर आगे बढ़ने से पहले लिए मैं आपको एक छोटी सी कहानी सुनाता हूं -

 एक दिन एक 15 साल का बच्चा एक आइसक्रीम की दुकान पर गया और टेबल पर बैठकर एक महिला वेटर से पूछने लगा "" एक कौन आइसक्रीम कितने की है..?
 महिला वेटर ने कहा  - "75 सेंट की"
 महिला के ऐसा कहने के बाद बच्चे ने अपने हाथ में दबे हुए सिक्कों को जीना और एक बार फिर महिला से पूछा/-" छोटे कफ वाली आइसक्रीम कितने की है..?  कहा 65 सेंस की 
 बच्चा बोला "मुझे छोटा काफ ही दे दो।"
 इसके बाद लड़के ने आइसक्रीम ली, साइड में बैठकर मजे से खाई, पेमेंट किया और चला गया। जब वेटर खाली प्लेट उठाने आई तो उसने जो कुछ देखा वह बात उसके मन को छू गई। क्योंकि वह बच्चा जाते समय $1 टिप का रख कर गया था। उसे छोटे बच्चों ने उसे महिला वेटर का ख्याल किया। उसका ध्यान रखा उसके बारे में सोचा उसके प्रति संवेदनशीलता दिखाई। उसने खुद से पहले दूसरे के बारे में सोचा। ऐसी सोच और और दूसरों की फिक्र करने की खासियत हमें औरों से अलग बनाती है ऐसी विशेषताओं वाले इंसान की जिंदगी खुशनुमा और कामयाबी को छूने वाली बन जाती है।

 3. सब की जीत के बारे में सोचें :

 आगे बढ़ने से पहले लिए पहले इस कहानी को पढ़ते हैं -
Kaha

"मनालीराम" नाम के एक व्यक्ति की मौत हुई। जो वह ऊपर यमराज के सामने पहुंचा, तो यमराज में उसे पर दया करते हुए सवाल किया की बात नर्क में जाना चाहता है...?  या स्वर्ग में..? फैसला करने से पहले मनीराम ने यमराज से पूछा - " क्या पहले में दोनों जगह देख सकता हूं." यमराज ने हां कह दिया और यमराज के दूध सबसे पहले मनीराम को नरक ले गए। वहां उसने देखा एक बहुत बड़ी जगह थी जिसमें मेज पर तरह-तरह की खान की चीज रखी थी उसने पीले और उदास चेहरे वाले लोगों की कटारे भी देखी वह बहुत भूखे जान पड़ रहे थे जबकि वहां खाने-पीने की अनेक चीज रखी हुई थी और वहां कोई हंसी खुशी नहीं थी प्रसन्नता वाली चीज नहीं थी एक गम का माहौल पसरा हुआ था। मनीराम ने एक और खास बात पर गौर किया कि उनके हाथों में 4 फुट लंबे कांटे और छुरियां बंधी हुई थी जिससे वह मेज पर रखे हुए खाने को खाने की कोशिश तो कर रहे थे मगर का नहीं पा रहे थे। यह सब दृश्य देखने के बाद मनीराम ने यमराज के सैनिक से कहा कि अब उसे स्वर्ग को दिखाया जाय। सो थोड़ी ही देर में सैनिक मनीराम को लेकर स्वर्ग पहुंच गया। मनीराम ने देखा कि स्वर्ग में भी एक बड़े हॉल में मैच पर ढेर सारा खाना लगा था उसने मैच के दोनों तरफ लोगों की लंबी कटारे अच्छी जिनके हाथों में भी 4 फुट लंबी छुरी और कांटे बंधे हुए थे। लेकिन इनके अंदर सहयोग और एक दूसरे की मदद करने की भावना थी इसलिए यह ऊंची मेजों पर खाने को रखकर एक दूसरे को मिला खिला रहे थे। इसीलिए स्वर्ग में खुशहाली समृद्धि आनंद और संतुष्टि का भाव था वे लोग सिर्फ अपने बारे में ही नहीं सोच रहे थे बल्कि सबकी जीत के बारे में सोच रहे थे यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है जब हम अपने परिवार अपने मालिक और अपने कर्मचारियों तथा ग्राहक करता पढ़ाई करते हैं और सच्चे मन से सेवा करते हैं तो हमें जीत खुद में खुद मिल जाती है।
 अपने शब्दों का चयन सोच समझकर करें :

 जो मन में आए वही नहीं बोलना चाहिए। गलत बोल बोलने से हमारी बेकार छवि लोगों के दिमाग में बनती है। जब हम गलत बोलते है तो आगे चलकर हमें गलत सुना भी पड़ता है इसलिए हमें व्यवहार में चतुर बनना चाहिए व्यवहार में चतुर होने का मतलब है कि हम अपने शब्दों का चुनाव समझदारी और होशियारी से करते हैं और यह भी जानने की कोशिश करें कि हम अपने शब्दों को किन संदर्भ में प्रयुक्त करते हैं। शब्दों से हमारा नजरिया झलकता है शब्द हमारी भावनाओं को चोट पहुंचा सकते हैं और हमारे रिश्तों को तोड़ सकते हैं लोगों को इतनी चोट तो कुदरत की ऊंचाई हुई तबाही से नहीं पहुंचती जितनी गाली गलौज या कठोर व्यवहार से पहुंचती है इसलिए हमेशा सोच समझकर बोलना चाहिए ने की बोलकर सूचना चाहिए समझदारी और बेवकूफी में यही फर्क है जरूर से ज्यादा बोलने का मतलब यह नहीं होता कि आप बातचीत करने में कुशल हैं बोलिए कम कहिए ज्यादा। मेरे नजरिए से बुद्धिमान और बेवकूफ आदमी भी सबसे बड़ा यही फर्क होता है एक बेवकूफ बिना सोचे समझे बोलता है जबकि एक बुद्धिमान हर बात को सोच समझ कर और तोल कर बोलता है करवट भरे शब्द। 
 करवट भरे शब्द इतना नुकसान पहुंचा सकते हैं जिसकी जिंदगी भर भरपाई नहीं की जा सकती कई बार देखा गया है की मां-बाप द्वारा बच्चों से की जाने वाली बातचीत का ढंग उनके भविष्य को शक्ल देता है 
 मुंह से निकली बात वापस नहीं आती 

कहानी
 एक किसान ने अपने पड़ोसी की निंदा की। और अपनी इस गलती का एहसास होने पर वह पादरी के पास क्षमा मांगने गया। पादरी ने उससे कहा कि वह पंखों से भरा एक थैला शहर के बीचो-बीच में बिखेर दे। किसान ने वही किया फिर पादरी ने कहा कि जो और सभी पंख थैली में भर लो किस ने ऐसा करने की बहुत कोशिश की मगर सारे पंख इधर-उधर उठ गए थे अब वह खाली थैला लेकर लौटा तो को पादरी ने कहा कि यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है तुमने बात तो आसानी से कह दी लेकिन उसे वापस नहीं ले सकते इसलिए शब्दों के चुनाव में ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए। मुंह से निकली हुई बात गहरे जख्म दे जाती है इसलिए गलत बात की आदत लगने पर हमारे संबंध तेजी से बिगड़ जाते हैं। मुंह से निकली हुई बात गलत कभी वापस नहीं होती इसलिए हमें बहुत सोच समझ कर यकीन के साथ अपनी बात बोलनी चाहिए ताकि संबंध मधुर बने रहे और व्यक्तित्व अच्छा बरकरार रहे। जिन लोगों के जिंदगी में सोच समझ कर बात बोलने की आदत है उन लोगों का जीवन खुशहाल और कामयाब होता है। 

 आलोचना और शिकायत न करें :

 जब मैं आलोचना की बात करता हूं तो आलोचना से मेरा मतलब नकारात्मक आलोचना से है। आलोचना करनी चाहिए हम आलोचना क्यों ना करें..? जब किसी की बुराई की जाती है तो उसका रवैया खुद को बचाने का हो जाता है एक आलोचना एक ड्राइवर को पागल बना देंगे वाले वैक्सीन ड्राइवर की तरह होता है क्या क्या इसका मतलब यह है कि हमें कभी आलोचना नहीं करनी चाहिए या हम सही आलोचना कर सकते हैं।
 सही आलोचना 

 रचनात्मक आलोचना कैसे की जाती है..? नीचा दिखाने के लिए नहीं बल्कि मदद करने के इरादे से आलोचना कीजिए आलोचना करते समय हल पेश करना भी जरूरी होता है आलोचना करते समय व्यवहार की आलोचना करें नेक व्यक्ति की क्योंकि जब हम व्यक्ति की आलोचना करते हैं तो उसके स्वाभिमान को ठेस पहुंचती है। अगर आलोचना करने में आलोचक को आनंद नहीं मिल रहा तो इसका मतलब उसे आलोचना करने का हक है लेकिन उसे आलोचना करने में मजा आने लगे तो उसे आलोचना रोक देनी चाहिए।

 दूसरों को प्रेरित करने वाली आलोचना के बारे में--

दूसरों को प्रेरित करने वाली आलोचना के बारे में 
 1. आलोचना के पीछे हमारा नजरिया सुधारने वाला होना चाहिए ने की सजा देने वाला।
2. आलोचना समझने के लिए करें नेक डराने धमकाने के लिए।
3. तीखा स्वभाव ने अपने क्योंकि यह नाराजगी का निर्माण करता है।
4. सहायता करने की भावना से आलोचना करें जैसे एक कोच अपने खिलाड़ियों की आलोचना उनके खेल को सुधारने के लिए करता है।
5. अगर हम किसी को समझते हैं और उसकी परवाह करते हैं तो इससे संबंधित व्यक्ति को प्रेरणा मिलती है।
6. 'तुम हमेशा" या 'तुम कभी नहीं" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने के बजाय आलोचना सीधे शब्दों में करें घुमा फिरा कर बात करना काफी तकलीफ वाला होता है।
7. आलोचना करने से पहले किसी भी बात या घटना के बारे में असलियत को जाने उसके बाद अपनी राय रखें आलोचना करने में जल्दबाजी ने दिखाएं।
8. आलोचना सही तरीके से की जाए।
9. आलोचना हमेशा अकेले में करें सबके सामने नहीं ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसा करने से मित्रता की भावना बनी रहती है जबकि दूसरों के सामने आलोचना करना अपमानजनक लग सकता है। ऐसा होने से जाहिर है आपके संबंध खराब होंगे। आते आलोचना करने में सावधानी बरतनी चाहिए।
10. दूसरे व्यक्ति को अपनी सफाई या अपना वक्तव्य रखने की इजाजत दी जानी चाहिए।
11. लोगों को गलतियां सुधारने के फायदे और के बारे में बताएं
12. काम करने वाले की आलोचना न करें। आलोचना करते समय निजी नाराजगी जाहिर न होने दें। 
13. आलोचना एक दवा की तरह है, इसलिए इसे सीमित दायरे में ही करें। जैसे एक दवा को सही मात्रा में लेना ही ठीक होता है। ठीक उसी तरह आलोचना की भी सीमा होती हैं। कई बार हम देखते हैं कि ज्यादा दवा देने से नुकसान हो जाता है और काम दवाई देते हैं तो मरीज पर असर नहीं होता ठीक उसी तरह आलोचना भी दायरे में होनी चाहिए सही ढंग से किए जाने पर यह बहुत फायदेमंद हो सकती है आलोचना करते पर अगर कोई व्यक्ति गलती सुधार लेता है और सही कदम उठाता है तो उसे शाबाशी दिन अपनी बात सकारात्मक रोक और प्रशंसा के साथ खत्म करें भले ही शुरुआत आलोचना से की हो।

- आलोचना स्वीकार करना

 हर आदमी के आलोचना करने का अलग-अलग ढंग है। हो सकता है कि हमारी आलोचना कभी सही और कभी गलत ढंग से की जाती हो। पर इसमें बुरा कुछ नहीं है क्योंकि आलोचना काफी हद तक हमें फायदा ही पहुंच आती है और दुनिया में जितने भी महान लोग हुए हैं सबकी आलोचना हुई है। सही आलोचना फायदेमंद होती है और मेरा खुद का मानना है कि सही आलोचना को एक अच्छी सलाह के रूप में कबूल करना चाहिए। नाजायज आलोचना ठीक नहीं। 
 कई बार कोई छात्र जब सफल नहीं होता तो अक्सर वह ऐसा करता है कि जो सफल छात्र होते हैं उनका निशाना बनाना शुरू कर देता है। ठीक है ऐसे ही हम सब लोग भी करते हैं। जब हम सफल नहीं हो पाए तो सारी फंगस पड़ोस के किसी सफल आदमी पर उतार देते हैं। आलोचना करें..। मगर ध्यान रखें की आलोचना हमेशा अच्छे इरादे से करें। अब सवाल यह होता है और बहुत से लोग मुझसे पूछते भी हैं कि 

आखिर एक इंसान गलत आलोचना क्यों करता है..?

 
तो लिए मैं आपको बताता हूं कि गलत आलोचना इन दो खास वजह से होती है -
1. ज्ञान की कमी- जब आलोचना ज्ञान की कमी की वजह से की जाती है तो सही जानकारी देकर उसे आसानी से सुधार या बंद कराया जा सकता है
2. द्वेष या जलन- जब आलोचना ईर्ष्या वश कि जाती है तो इसे भी अपनी तारीफ समझ कर स्वीकार कर लेना चाहिए। क्योंकि हमारी गलत आलोचना इसलिए हो रही है क्योंकि आलोचना करने वाला खुद अपने आप को हमारी जगह देखना चाहता है लेकिन वहां ने हो पाने के कारण वे तारीफ की जगह आलोचना करता है जैसे जिस पेड़ पर सबसे ज्यादा फल लगते हैं इस पर साथ सबसे ज्यादा पत्थर मारे जाते हैं।
 मददगार बने के बजाय जिंदगी में कभी-कभी अपने ही तकलीफ दे और मुश्किल खड़ी करने वाले बन जाते हैं। पर जीवन में ऐसा होता ही है। और कामयाबी पाने के लिए हमें आगे बढ़ना पड़ता है। जब हमारे अपने ही मददगार से दुश्मन बन जाते हैं तो अक्सर उनके इस व्यवहार के पीछे की वजह उनकी जलन और ईर्ष्या से होती है।

 आलोचना स्वीकार करने का हुनर कैसे पैदा करें

 है आलू चुनाव को स्वीकार करने की काबिलियत होना बेहद जरूरी होता है। क्योंकि अधिकतर लोग आलोचना को गलत अंदाज से लेते हैं। आलोचना स्वीकार करने की क्षमता हमारे अंदर होनी चाहिए। रचनात्मक आलोचना को स्वीकार करने की काबिलियत होना चाहिए। 
 आलोचना को स्वीकार करने के लिए कुछ सुझाव --

1. सबसे पहली बात यह है की आलोचना को स्वीकार करना और सही ढंग से लेना सिख है। 
2. जब भी कोई आलोचना करे तो उसे दरिया दिल्ली के साथ स्वीकार करें ने की मनमुटाव के साथ।
3. आलोचना को सकारात्मक के साथ स्वीकार करें और अगर वह सही लगती हो तो उसे कबूल करें उसे सीखें और उसे पर अमल करें। यही तो आलोचना का सबसे बड़ा फायदा है।
4. रचनात्मक आलोचना को तुरंत खुली मन से स्वीकार करें।
5. उसे इंसान का शुक्रिया अदा करें जो हमारी रचनात्मक आलोचना करता है क्योंकि वह हमारी भलाई और हमारी सहायता करना चाहता है।
6. सकारात्मक आलोचना एक व्यक्ति को बेहतर बनाती है नेकी खराब।

 पर हम में से अधिकतर लोगों की समस्या यह है कि वह एक अच्छी आलोचना को स्वीकार करने के बजाय झूठी तारीफें सुनना ज्यादा पसंद करते हैं। आकर आजकल झूठी शान और शौकत का नजारा है।
 " लोगों को रचनात्मक आलोचना स्वीकार करने के बजाय झूठी तारीफ सुनकर बर्बाद होना पसंद है "


 शिकायत 

 आपने देखा होगा ऐसे बहुत से लोगों को जो अक्सर शिकायत करने की बीमारी से ग्रसित होते हैं। वो हमेशा शिकायत करते रहते हैं। उनका सारा ध्यान सिर्फ शिकायतों पर केंद्रित रहता है। अगर गर्मियों के दिन है तो,. बहुत गर्मी है यार..! सर्दियों के दिनों में, बहुत ठंड है भाई..! बरसात के दिनों में, बरसात बहुत हो रही है यार....! कैसे काम चलेगा..! ऐसे लोगों के लिए हर दिन खराब है, हर मौसम खराब है। जब सब कुछ ठीक होता है, चारों तरफ खुशियां होती हैं तब भी यह शिकायत करते हैं। आपको पता है 50% लोगों को इससे कोई मतलब नहीं होता कि हमको कोई समस्या है और शेष 50% लोग इसलिए खुश होते हैं क्योंकि उनका कोई समस्या है फिर शिकायत करने से फायदा क्या है..? इससे कोई नतीजा नहीं निकलता यह तो शख्सियत का हिस्सा बन जाती है हमारी आदत बन जाती है शिकायत करने की। क्या इसका यह मतलब हुआ कि हमें कभी शिकायत नहीं करनी चाहिए..?  हरगिज़ नहीं..। यदि यदि आलोचना और खासकर सकारात्मक आलोचना की तरह अगर इससे भी सही ढंग से लिया जाए तो शिकायत काफी उपयोगी भी हो सकती है। क्योंकि शिकायत के बाद ही आदमी को सीखने और सुधारने का मौका मिलता है। रचनात्मक ढंग से की गई शिकायत यह दिखाती है की शिकायत करने वाला आपकी परवाह करता है। वह आपके बारे में सोचता है और आपका भला चाहता है इसीलिए उसने इस बात को शिकायत के रूप में दर्ज करवाया है कि कहीं आपका आगे चलकर अहित न हो जाए। शिकायत से हमें सुधार का मौका मिलता है।

 मुस्कुराए और दयालु का दिखाएं 
 
 मुस्कान पर कोई कविता बनाकर उसे यहां प्रकाशित करें।

मुस्कुराना और दयालु बनना जरूरी है क्योंकि यह न केवल हमारे अपने जीवन को बेहतर बनाता है, बल्कि दूसरों के जीवन में भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। यहाँ कुछ कारण हैं:

*मुस्कुराने के फायदे*

1. *तनाव कम करता है*: मुस्कुराने से तनाव और चिंता कम होती है।
2. *मूड अच्छा करता है*: मुस्कुराने से मूड अच्छा होता है और सकारात्मकता बढ़ती है।
3. *संबंध बेहतर बनाता है*: मुस्कुराने से दूसरों के साथ संबंध बेहतर बनते हैं और संचार आसान होता है।

*दयालु बनने के फायदे*

1. *दूसरों की मदद करता है*: दयालु बनने से हम दूसरों की मदद कर सकते हैं और उनके जीवन में सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।
2. *सहानुभूति बढ़ाता है*: दयालु बनने से हम दूसरों की भावनाओं को समझने और सहानुभूति दिखाने में सक्षम होते हैं।
3. *समाज में सकारात्मकता बढ़ाता है*: दयालु बनने से समाज में सकारात्मकता बढ़ती है और एक अच्छा माहौल बनता है।

*सामूहिक लाभ*

1. *सकारात्मक वातावरण*: मुस्कुराने और दयालु बनने से एक सकारात्मक वातावरण बनता है जो सभी के लिए फायदेमंद होता है।
2. *संबंध मजबूत होते हैं*: मुस्कुराने और दयालु बनने से संबंध मजबूत होते हैं और लोगों के बीच विश्वास बढ़ता है।
3. *जीवन की गुणवत्ता में सुधार*: मुस्कुराने और दयालु बनने से जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है और हम अधिक संतुष्ट और खुशहाल महसूस करते हैं।

इन कारणों से, मुस्कुराना और दयालु बनना न केवल हमारे अपने जीवन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि दूसरों के जीवन में भी सकारात्मक प्रभाव डालने के लिए भी जरूरी है।

 खुशमिजा की अच्छाई से पैदा होती है मुस्कान बनावटी भी हो सकती है और सच्ची भी मुद्दे की बात यह है की मुस्कान असली हो तेवर चढ़ाने में मुस्कुराने से ज्यादा मांसपेशियां खींचती है इसीलिए तेरियां चढ़ाने से मुस्कान अधिक आसान है इससे सूरत में करती है एक चिड़िया इंसान के साथ कौन रहना चाहेगा..? कोई भी नहीं.., सिवाय उस खुद के..! कहते हैं कि जब हम मुस्कुराते हैं तो दूसरे लोग भी मुस्कुराते हैं इससे हमारा चेहरा बिना कुछ खर्च किए ही निखर जाता है हंसते हुए नूरानी चेहरे को हमेशा पसंद किया जाता है दुनिया को मुस्कुराता हंसता हुआ चेहरा अच्छा लगता है। 

 दूसरों के व्यवहार का सही अर्थ निकाले  


घ पूरी जानकारी नहीं होने की वजह से लोग आदतन दूसरों द्वारा किए गए या नहीं किए गए काम का गलत अर्थ लगाते हैं कुछ लोग एक भ्रम के शिकार हैं। वे समझते हैं कि दुनिया उनके खिलाफ है और पीछे पड़ी हुई है। मगर ऐसा नहीं है सोच सकारात्मक होने से हमें शख्सियत को आकर्षक बनाने का अच्छा मौका मिलता है जिससे हमारे रिश्ते बेहतर बनते हैं मिसाल के तौर पर ऐसा कितनी बार होता है कि हम फोन करते हैं लेकिन दूसरी तरफ से दो दिन तक कोई जवाब नहीं आता तब तक तो पहली बात हमारे मन में यही आता है कि उन्होंने जवाब देने की जरूरत नहीं उठाई या उन्होंने मेरी परवाह नहीं कि यह नकारात्मक सोच है हो सकता है उन्होंने कोशिश की हो मगर हमारा नंबर नहीं मिला हो उन्होंने कोई संदेश छोटा हो जो हमें नहीं मिला हो उन्हें कोई मुश्किल घड़ी आ गई हो उन्हें हमारा संदेश मिला ही नहीं हो 
 और भी बहुत से कारण हो सकते हैं बेहतर है कि हम दूसरे व्यक्ति को संदेह का लाभ दे दें और यही सोचे कि उसकी गलती नहीं थी और अपना काम सही तरीके से जारी रखें

 अच्छे श्रोता बनें

ग हम अक्सर लोगों को यह कहते सुनते हैं की अच्छी बातचीत की कला दम तोड़ रही है। लेकिन मुझे लगता है कि अच्छा श्रोता मिलना काफी मुश्किल है वास्तव में एक अच्छा श्रोता काफी मूल्यवान होता है खुद से यह सवाल करें हमको कैसा लगता है जब हम चाहते हैं कि कोई व्यक्ति हमारी बात सुनी लेकिन --
1. वे सुनने से ज्यादा बोल 
2. हमारी पहली बात पर ही वह ऐसी माटी प्रकट कर दें 
3. वह हमको हर कदम पर टोकें
4. वेब बेसब्री दिखाएं और हमारे हर व्यक्ति को खुद पूरा करें 
5. वे सुन लेकिन समझ नहीं हमको हर बात तीन बार दोहरानी पड़े।
6. वे शरीर से तो मौजूद हैं लेकिन उनका दिमाग कहीं और है 
7. वह ऐसे नतीजे पर पहुंचे जिनके तत्वों से कोई संबंध नहीं है
8. वह ऐसे सवाल पूछे जिनका बातचीत के मुद्दों से कोई रिश्ता नहीं है.
9. वह बेचैन लग रहे हो और उनका ध्यान इधर-उधर भटक रहा हूं 
10. वह हमारी बातों पर ना ध्यान दे रहे हैं ने उन्हें सुन रहे हैं 

 यह सभी बातें इस बात को दर्शाती हैं कि उसे इंसान का हमसे बातचीत करने में या बातचीत के मुद्दों में कोई दिलचस्पी नहीं है और उसमें शिष्टाचार का अभाव है क्या खुद को अनसुना महसूस करने पर हमारे मन में पैदा होने वाले भाव को नीचे लिखी गई है बातें दर्शाती हैं --

 तिरस्कृत            अस्वीकृत 
 निराशा               मायूस 
 निराश महसूस करना 
 परेशान                बेवकूफ 
अनुपयोगी             महत्त्वहीन
 व्याकुल                छोटा   
 प्रेरणाहीन            अपेक्षित हताश 

अब इसका दूसरा पहलू देखे हमको कैसा महसूस होता है जब हम चाहते हैं कि कोई हमारी बात सुने और वह --
 बातचीत का माहौल आराम दायक बनता है 
सारा ध्यान हमारी तरफ लगता है 
जरूरी और विषय से जुड़े सवाल पूछता है 
हमारी बात के मुद्दों में दिलचस्पी लेता है 

 अपनी बात ध्यान पूर्वक सुने जाने पर क्या हम वैसा ही महसूस करते हैं जैसा आगे लिखा है। 

 महत्वपूर्ण      अच्छा खुश
 प्रसन्न            संतुष्ट 
 उपयोगी         प्रेरित
 उत्साहित        ख्याल रखा गया 

 कुछ बौद्धिक रुकावटें भी हो सकते हैं जैसे की भाषा की समझने की आधी दूसरों को बोलने के लिए प्रेरित करने के लिए खुद एक अच्छा श्रोता बने हमारे सुनने के ढंग से पता चलता है कि हम कितनी परवाह करते हैं हम जब दूसरे व्यक्ति के प्रति ख्याल रखने वाला नजरिया दिखलाते हैं तो वह व्यक्ति खुद को महत्वपूर्ण महसूस करता है जब वह महत्वपूर्ण महसूस करता है तो क्या होता है उसका हौसला बढ़ जाता है और वह हमारी बातें सुनने के लिए और भी अच्छी तबीयत तरह तैयार हो जाता है

 एक अच्छा श्रोता बनने के लिए -
1. दूसरों को बोलने के लिए उत्साहित करें
2. सवाल पूछे यह हमारी दिलचस्पी को बढ़ाता है 
3. किसी के बोलते समय उसमें रुकावट उत्पन्न नहीं करें।
4. बार-बार बातची त बदलने का प्रयास ने करें।
5. सम्मान और समाज का भाव दिखाएं 
6. ध्यान से सुने
7. ध्यान भटकने वाली चीजों से बचें 
8. अपने आप को दूसरे के स्थान पर रख कर देखें 
9. खुले विचारों वाले बने
10. बातचीत के मैसेज पर ध्यान देने की खाने के तरीके पर 
11. ने केवल शब्दों को सुन बाल की भावेश को समझें चेहरे पर आने वाले भावों को समझने का प्रयास करें

 9.  उत्साही बने : prernadayari.com











 










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